भारत सरकार की ग्रेट निकोबार परियोजना (Great Nicobar Project) इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित यह द्वीप अब केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर हब बनने की राह पर है। नीति आयोग द्वारा संचालित इस 72,000 करोड़ रुपये की मेगा परियोजना का उद्देश्य भारत को वैश्विक व्यापार के नक्शे पर एक नई ऊँचाई देना है।
यह परियोजना केवल एक पोर्ट या एयरपोर्ट का निर्माण नहीं है, बल्कि यह एक “होलिस्टिक डेवलपमेंट प्लान” है। इस निकोबार प्रोजेक्ट के तहत चार प्रमुख स्तंभ तैयार किए जा रहे हैं:
एक स्मार्ट टाउनशिप: जहाँ 6 लाख से ज्यादा लोगों के रहने की व्यवस्था होगी।
पावर प्लांट: पूरे द्वीप को ऊर्जा देने के लिए एक हाइब्रिड बिजली संयंत्र।
Great Nicobar Project
सामरिक और आर्थिक महत्व
निकोबार प्रोजेक्ट के पीछे भारत का एक बहुत बड़ा रणनीतिक विजन छिपा है। निकोबार द्वीप ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ (Strait of Malacca) के बहुत करीब है, जहाँ से दुनिया का 30-40% व्यापार गुजरता है। वर्तमान में, भारतीय जहाज अक्सर कोलंबो या सिंगापुर के बंदरगाहों पर निर्भर रहते हैं।
इस निकोबार प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद, भारत खुद एक प्रमुख ग्लोबल शिपिंग हब बन जाएगा। साथ ही, हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए, यहाँ एक मजबूत सैन्य और नागरिक अड्डा होना भारत की सुरक्षा के लिए ‘ब्रह्मास्त्र’ साबित होगा। इस निकोबार प्रोजेक्ट से हज़ारों की संख्या में रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है।
पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों की चुनौती
जहाँ एक तरफ यह प्रोजेक्ट देश की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरणविद् इस निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर गहरी चिंता जता रहे हैं। इसके विरोध में कई तर्क दिए जा रहे हैं:
जंगलों की कटाई: इस निकोबार प्रोजेक्ट के लिए लगभग 130 वर्ग किलोमीटर के प्राचीन उष्णकटिबंधीय वर्षावनों को काटा जाएगा। अनुमान है कि लगभग 8.5 से 9.6 लाख पेड़ गिराए जा सकते हैं।
जैव विविधता का संकट: यह द्वीप यूनेस्को बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा है। यहाँ पाए जाने वाले दुर्लभ ‘निकोसारी मेगापोड’ पक्षी और विशाल ‘लेदरबैक कछुओं’ के प्रजनन स्थलों पर इस निकोबार प्रोजेक्ट का सीधा असर पड़ेगा।
आदिवासी समुदायों का अस्तित्व: यहाँ ‘शोंपेन’ और ‘निकोबारी’ जैसी आदिम जनजातियाँ रहती हैं। बाहरी दुनिया के लाखों लोगों के यहाँ बसने से इन जनजातियों की संस्कृति और स्वास्थ्य पर संकट मंडरा सकता है।
ग्रेट निकोबार परियोजना
क्या संतुलन बनाना संभव है?
सरकार का कहना है कि निकोबार प्रोजेक्ट के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई ‘क्षतिपूरक वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) के जरिए की जाएगी। इसके लिए हरियाणा जैसे राज्यों में पेड़ लगाने की योजना है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि निकोबार के लाखों साल पुराने ईकोसिस्टम की भरपाई कहीं और पेड़ लगाकर नहीं की जा सकती।
इस निकोबार प्रोजेक्ट में पर्यावरण मंत्रालय ने कई शर्तें भी रखी हैं, जैसे कछुओं के संरक्षण के लिए विशेष कॉरिडोर बनाना और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करना। लेकिन चुनौती यह है कि विकास की इस तेज रफ्तार में क्या प्रकृति को सुरक्षित रखा जा सकेगा?
निष्कर्ष
निकोबार प्रोजेक्ट भारत की विकास यात्रा का एक साहसिक कदम है। यह हमें वैश्विक समुद्री व्यापार का राजा बना सकता है और हमारी समुद्री सीमाओं को अभेद्य सुरक्षा प्रदान कर सकता है। लेकिन, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘ग्रेट निकोबार’ पृथ्वी के उन दुर्लभ स्थानों में से एक है जो अब तक मानवीय हस्तक्षेप से बचा हुआ है।
एक ‘ह्यूमन फ्रेंडली’ दृष्टिकोण यह कहता है कि हमें विकास जरूर चाहिए, लेकिन वह विनाश की कीमत पर न हो। यदि सरकार इस निकोबार प्रोजेक्ट को पर्यावरण और मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाती है, तो यह वास्तव में 21वीं सदी के भारत की एक शानदार उपलब्धि होगी।
निकोबार प्रोजेक्ट
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